Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
युक्त्या वै चरतो ज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः ।
दूरसंत्यक्तयुक्तेस्तु महामत्तार्णवोपमः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तब भूत भी तो बहुत हैं, बचे हुए भूतों के भी अनन्त होने से उनसे उद्धार पाना संभव नहीं है। ऐसा
यदि कोई कहे, तो ठीक है, अज्ञानियों की दृष्टि में ऐसा ही है, तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में तो (अन्नेन सोम्य
शुंगेनापो मूल मन्विच्छ” इस श्रुति में दशित युक्ति से सबके अधिष्ठानभूत ब्रह्म के दर्शन से भूतो में भी
ये सत्य हैं, ये मिथ्या है, ऐसे निश्चय से भूतो से भी निस्तार पाना सुलभ ही है, इस आशय से कहते हैं।
युक्ति से व्यवहार कर रहे ज्ञानी का संसार गौ के खुर के समान अनायास तरने योग्य है, किन्तु
जिसने युक्ति का दूर से परित्याग कर दिया है, ऐसे अज्ञानी का संसार प्रलय के महासागर के समान
दुस्तर है