Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 61, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 61, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
अनित्यता स्वमनसा विविधैवाशु भावतः ।
आदावन्ते च यां नित्यं क्रिया त्रैलोक्यवर्तिनीम् ॥ १० ॥
पदार्थानापदेवाशु भावयेन्नेतरत्सुधीः ।
असम्यग्दर्शनं त्यक्त्वा व्यर्थमज्ञानसंततिम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार भावना करनेवाले पुरुष को अत्यन्त आदर के साथ सब वस्तुओं की विविध
निमित्तो से उपपन्न होनेवाली अनित्यता का भी विचार करना चाहिये । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार
अनित्यता का विचार कर रहा विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष अज्ञान को बढ़ानेवाले मिथ्या सम्यग्दर्शन का
त्याग कर पहले ऐहिक विषयों के उपभोग के योग्य लौकिक क्रिया की, मरने के बाद उपयोग में आनेवाली
पारलौकिक क्रिया की और उन क्रियाओं के फल, पशु, पुत्र, धन, स्वर्ग विमान, अप्सरा आदि पदार्थों
की, ये आपत्ति ही हैं, ऐसी भावना करें, ये सम्पत्ति है, ऐसी भावना कभी न करें