Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 7, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति शुक्रः पुरं प्राप्य वैबुधं स्वेन तेजसा ।
विसस्मार निजं भावं प्राक्तनं व्यसनं विना ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी , पूर्वोक्त मनोराज्य के प्रभाव से शुक्राचार्य देवलोक
में पहुँचकर अपने पुण्यप्रताप से मरण-दुःख के बिना ही अपने प्राक्तन भाव को (शुक्राचार्य को) भूल
गये
सर्ग सन्दर्भ
छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्म स्वर्ग में शुक्र का पुनः अपनी प्रिया को देखना और परस्पर के प्रेमाधिक्य से दोनों का संगम होना।