Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 7, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
चन्द्रकान्त इव ज्योत्स्नां शीतलां खे विलासिनीम् ।
तेनावलोकिता सापि तत्परायणतां गता ॥ ७ ॥
निशान्ते चक्रवाकेन कान्तेव परिकूजिता ।
रसाद्विकसिता नूनमन्योन्यमनुरक्तयोः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
रात्रि में वियोग होने के उपरान्त रोदन करनेवाली चक्रवाकी जैसे प्रातःकाल में चक्रवाक द्वारा
देखी जाती हे वैसे ही शुक्राचार्य के प्रति अनुरक्त वह भी शुक्राचार्य से देखी गई । अत्यन्त प्रेम होने के
कारण उसकी शोभा का ठिकाना न रहा । परस्पर एक दूसरे पर अनुरक्त हुए सूर्य और कमलिनी की
प्रातःकाल में जो शोभा होती है, वही उन दोनों की हुई