Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verses 13–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 1, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
तत्रस्थेषु तथान्येषु तदा मुनिषु राजसु ।
सुधौतचित्तरत्नेषु प्रोल्लसत्स्विव चेतसा ॥ १३ ॥
उदभूत्पूरयन्नाशाः कल्पाभ्ररवमांसलः ।
अथ मध्याह्नशंखानामब्धिघोषसमः स्वनः ॥ १४ ॥
महता तेन शब्देन तिरोधानं मुनेर्गिरः ।
ययर्जलदनादेन कोकिलध्वनयो यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय वहाँ पर बैठे हुए अन्यान्य राजा ओर मुनि, जिनके चित्तरूपी रत्न भली-भाँति धुल गये
थे, चित्त से उल्लसित -से हो गये उस समय दशो दिशाओं को पूर्ण करती हुई, प्रलयकाल के मेघ के
गर्जन के समान तेज ओर सागर के घोष के तुल्य गम्भीर मध्याहकाल के शंखो की ध्वनिर्यो तिरोहित हो
जाती हैं