Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 1, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
नभश्चरान्धरणिचरानधश्चरान्विसृज्य संस्तुतगुणगोचरांश्च तान् ।
यथाक्रमं स्वगृहमुदारसत्त्ववांश्चकार तां द्विजजनवासरक्रियाम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में रहनेवाले, भूमि में रहनेवाले और पाताल में रहनेवाले उन सबको, जो
कि उत्तम-उत्तम गुणों से अलंकृत थे, यथा योग्य बिदा करके अपने घर में प्रवेश कर उदारचरित
श्रीवसिष्ठजी ने द्विजातियों की दिवसोचित पंचयज्ञ क्रिया की