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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 10, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 14, 15

संस्कृत श्लोक

चित्त चातुर्यमेतस्माद्भोगाभ्यासकुसंभ्रमात् । त्यज जन्मजराजाड्यजालजम्बालशान्तये ॥ १४ ॥ दशासु स्वासु यास्वेव संभ्रमं चित्त पश्यसि । ताभ्य एवाभिरचितं परमं दुःखमेष्यसि ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे चित्त, तुम इस भोगाभ्यासरूपी दुर्भम से सुखलव के आस्वाद की जो चतुरता है, उसका जन्म, वृद्धावस्था एवं जडता के समूहरूपी कीचड़ की शान्ति के लिए त्याग कर दो । हे चित्त, तुम विषयाभिलाषा, उनके लिए उद्योग, उनके उपभोग ओर उनके स्मरण आदिरूप जिन-जिन अपनी अवस्थाओं मे सुखलव के आस्वाद की भ्रान्ति अथवा उत्साह देखते हो, तुम उन्हीं अवस्थाओं से सम्पादित परम दुःख को प्राप्त होओगे