Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 11, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 11, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति संचिन्त्य जनको यथाप्राप्तां क्रियामसौ ।
असक्तः कर्तुमुत्तस्थौ दिनं दिनपतिर्यथा ॥ १ ॥
इष्टानिष्टाः परित्यज्य चेतसा वासनाः स्वयम् ।
यथाप्राप्तं चकारासौ जाग्रत्येव सुषुप्तवत् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त रीति से विचार कर राजा जनक जैसे सूर्य दिवस
का सम्पादन करने के लिए उठते (उदित होता) है वैसे ही कर्तृत्व-भोक्तृत्वाभिमानरूप आसक्ति से
रहित होकर यथा प्राप्त क्रिया का संपादन करने के लिए उठे । यह मेरा इष्ट है, यह मेरा अनिष्ट हे, इस
कल्पना में निमित्तभूत वासनाओं का स्वयं चित्त से त्याग कर उन्होने जाग्रत अवस्था में ही सुषुप्त के
समान (कारण कि स्थूल, सूक्ष्म देह आदि का अभिमान न होने पर जाग्रत ओर सुषुप्ति में कोई भेद नहीं
रहता) यथा प्राप्त कर्म किया
सर्ग सन्दर्भ
ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग॑ आहिक कार्य को कर चुके राजा का रात्रि के अन्त में अनेकों विचित्र विवेकों से अपने चित्त का प्रबोधन ।