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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 11, Verses 15–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 11, verses 15–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

चित्त त्वमथ दृश्यं च द्वे एव यदि सन्मये । सदास्थिते तत्प्रसरः कुतो हर्षविषादयोः ॥ १५ ॥ तस्मान्महाधिं मुञ्च त्वं मूकमुल्लासमाहर । संक्षुब्धाम्बुधिमाविष्टां त्यजाभव्यामिमां स्थितिम् ॥ १६ ॥ कन्दुकालातवद्व्यर्थमात्मनैव परिज्वलन् । मा मोहमलमासाद्य मन्दतां गच्छ सन्मते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

दोनों सत्‌ ही हैं। कोई भी असत्‌ नहीं है, इसमें भी कभी इष्ट का वियोग न होने से हर्ष तथा विषाद का अवसर नहीं है, ऐसा कहते हैं। हे चित्त, तुम और दृश्य दोनों ही यदि सन्मय ओर सदा रहनेवाले हो, तो हर्ष और विषाद का विस्तार ही कहाँ है इसलिए तुम महान विषाद का त्याग करो । आत्म-स्वरूप स्थिति में उत्साह को समाधि के अभ्यास से जगाओ, वह मौन होकर स्थित है । विक्षेपरूप सागर में आविष्ट हुई इस अमंगलमय स्थिति का त्याग करो । उत्सवों में लोगों के कौतुक के लिए बारूद आदि से बने हुए कन्दुकाकार अलात यन्त्र के (अनार यानी एक प्रकार की आतिशबाजी के) समान व्यर्थ अपने-आप जल रहे तुम मोहरूपी मल को प्राप्त होकर हे सन्मते, मन्दता को प्राप्त मत होओ