Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 11, Verses 9–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 11, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

संसारसृष्टितरलामिमां तुलय सुन्दर । अस्यां चेत्सारमाप्नोषि तदेतामेव संश्रय ॥ ९ ॥ आस्थां यस्मात्परित्यज्य दृश्यदर्शनलालसात् । मैतद्गृहाण मा मुञ्च स्वेच्छया विहरेच्छया ॥ १० ॥ इदं दृश्यमसत्सद्वाप्युदेत्वस्तमुपैतु वा । साधो विषमतां गच्छ मैतदीयैगुणागुणैः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सुन्दर, इस चंचल संसारसृष्टि और शान्तिसुख को तराज्‌ में रखकर अपनी बुद्धि से कौन सारभूत है, इसकी परीक्षा करो | यदि तुम्हें संसारसृष्टि में सार प्रतीत हो, तो इसी संसारसुष्टि का अवलंबन करो । चूँकि यह संसारसृष्टि असार है, इसलिए तुम इसमें आदर का त्याग कर यह साररहित दृश्य दर्शन योग्य है, इस प्रकार की दर्शनलालसा से प्रिय का ग्रहण मत करो ओर अप्रिय का यह दर्शन के अयोग्य हे, यों द्वेष से त्याग न करो; किन्तु प्रिय ओर अप्रिय दोनों के साक्षी एकमात्र आत्मा की इच्छा से आत्मकाम होकर इच्छापूर्वक विहार करो । पहले अविद्यमान यह दृश्य सुखदुःख के साधनरूप से उदित हो अथवा इस समय विद्यमान यह नष्ट हो, किन्तु हे साधो, तुम इसके उदय ओर नाश से उदय नाश प्रयुक्त हर्ष-विषादरूप विषमता को प्राप्त मत होओ