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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verses 30–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 12, verses 30–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 30-36

संस्कृत श्लोक

यत्प्राप्ताः संपदं दैवीमपि भूमिचरा नराः । प्रज्ञापुण्यलतायास्तत्फलं स्वादु समुत्थितम् ॥ ३० ॥ प्रज्ञया नखरालूनमत्तवारणयूथपाः । जम्बुकैर्विजिताः सिंहाः सिंहैर्हरिणका इव ॥ ३१ ॥ सामान्यैरपि भूपत्वं प्राप्तं प्रज्ञावशान्नरैः । स्वर्गापवर्गयोग्यत्वं प्राज्ञस्यैवेह दृश्यते ॥ ३२ ॥ प्रज्ञया वादिनः सर्वे स्वविकल्पविलासिनः । जयन्ति सुभटप्रख्यान्नरानप्यतिभीरवः ॥ ३३ ॥ चिन्तामणिरियं प्रज्ञा हृत्कोशस्था विवेकिनः । फलं कल्पलतेवैषा चिन्तितं संप्रयच्छति ॥ ३४ ॥ भव्यस्तरति संसारं प्रज्ञयापोह्यतेऽधमः । शिक्षितः पारमाप्नोति नावा नाप्नोत्यशिक्षितः ॥ ३५ ॥ धीः सम्यग्योजिता पारमसम्यग्योजिताऽऽपदम् । नरं नयति संसारे भ्रमन्ती नौरिवार्णवे ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

भूमिचर लोग भी आकाशगमन आदिरूप दैवी सम्पत्ति को जो प्राप्त हुए हैं, वह भी प्रज्ञारूपी पवित्र लता से उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट फल है। जिन सिंहों ने अपने पंज से मत्त गजेन्द्रो के कुम्भस्थल फाड़ डाले, वे भी प्रज्ञा से सियारों द्वारा ऐसे पराजित हुए हैं, जेसे सिंहो से हरिण पराजित होते है । साधारण से भी साधारण लोगों ने अपनी प्रज्ञा से राजगद्दी प्राप्त की हे । इस लोक में प्रज्ञा में ही स्वर्ग ओर अपवर्ग की योग्यता दिखाई देती है । अतिभीरु भी सब वादीजन प्रज्ञा से ही अपने विकल्पों से शोभित होनेवाले प्रगल्भवादियों को जीत लेते हैं विवेकी पुरुष के हृदयकोश में स्थित यह प्रज्ञा चिन्तामणि रूप है, यह कल्पलता की नाई वांछित फल देती हे । कुशल पुरुष प्रज्ञा से संसार से निस्तार पाता है और अधम पुरुष डूबता है । ठीक भी है, नौका चलाने की शिक्षा को प्राप्त हुआ केवट नौका से पार चला जाता है ओर नौका चलाने में अशिक्षित केवट पार नहीं पहुँचता । प्रज्ञा को नौका के समान यदि विवेक वैराग्य आदि सन्मार्ग मे लगाई जाय, तो पार पहुँचाती है किन्तु राग, द्वेष, आदि असत्‌ मार्ग मे लगाई गयी, संसार में भ्रमण करती हुई बुद्धि सागर में घूमती हुई नौका के समान मनुष्य को आपत्ति देती हे