Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 107–108
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 107–108 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 107
संस्कृत श्लोक
मौर्ख्यं यदापदान्विष्टः का हि नापदजानतः ।
पश्य मौर्ख्यादियं सृष्टिरज्ञानेनैव जन्यते ॥ १०७ ॥
हा कष्टमपि दुर्बुद्धेः सृष्टिर्मौर्ख्यवशं गता ।
असतैव यदेतेन जीवेनाप्युपपाद्यते ॥ १०८ ॥
हिन्दी अर्थ
जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियों का भाजन होता हे,
इसमें तनिक भी विवाद नहीं हे, क्योकि मूर्ख को कौन आपत्ति नहीं है, अर्थात् सभी आपत्तियाँ है, देखिये
अज्ञानी ने ही मूर्खता दुष्कर्म आदि द्वारा इस सृष्टि को उत्पन्न किया है जो सब आपत्तियों की खान
है