Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 110
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 110 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 110
संस्कृत श्लोक
नीलाञ्जनालवालेन यन्त्रेणैव विचूर्ण्यते ।
इन्दोराभोगपूर्णस्य करस्पर्शेन मुह्यति ॥ ११० ॥
हिन्दी अर्थ
वही जल जहाँ पर भँवरी होती है, वहो पर नीलांजन
के तुल्य वर्णवाला, बीच में छेद से युक्त, पीसने के यन्त्र से मानों चूर-चूर किया जाता हे, फिर वही जल
जहाँ पर कोपा है, वहाँ पर मण्डल से पूर्ण चन्द्रमा के किरण-स्पर्श से मानों उन्मत्त होता है, इस प्रकार
की जैसे भ्रान्ति होती है, वैसे ही यह भी भ्रान्ति है