Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
मन एवमसत्कल्पं चित्प्रसादेन जीवति ।
भावयन्विश्वमेवैकं चिन्तामेत्य चिदप्युत ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार मन असत्कल्प है, यह बात
सिद्ध हुई, यह एक अद्वितीय आत्मा का विस्मरण कर, उसकी जगत के आकार से भावना कर स्वयं
जगदाकार हो चित्तत्त्व की कृपा से जीता है, इसलिए आत्मस्मृति को प्राप्त कर फिर चित् भी हो जाता
है यानी मनस्ता का त्याग करता है