Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 80–81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 80–81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 80
संस्कृत श्लोक
परस्य पुंसः संकल्पमयत्वं चित्तमुच्यते ।
अचित्तत्वमसंकल्पान्मोक्षस्तेनाभिजायते ॥ ८० ॥
एतावच्चेतसो जन्म बीजं संसारभूतये ।
संकल्पोन्मुखतां यातः संविदो वा किलात्मनः ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी उत्पत्ति का विरोधी होने से भी मन की आत्मदर्शन में शक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं।
परम पुरुष की जो संकल्पमयता है, वही चित्त शब्द से कही जाती है । असंकल्प से चित्त का
अभाव होता है, उससे मुक्ति होती है। भाव यह है कि जिसकी उत्पत्ति संकल्पमयता के अधीन है, वह
भला संकल्पों के क्षय से उपलक्षित मोक्षरूप आत्मा में कैसे प्रवृत्त होगा ?