Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 83
संस्कृत श्लोक
प्राणशक्तौ निरुद्धायां मनो राम विलीयते ।
द्रव्यच्छायानु तद्द्रव्यं प्राणरूपं हि मानसम् ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदेतत्स्यन्दितं नाम“ इत्यादि से जो विषय प्रस्तुत किया, उसका प्रयोजन कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दर्पण आदि पदार्थ का प्रतिबिम्ब उसके नष्ट होने पर तुरन्त नष्ट हो जाता
है वैसे ही प्राणशक्ति के निरुद्ध होने पर मन लीन हो जाता हे, क्योंकि जैसे प्रतिबिम्ब दर्पण का प्रतिरूप
है वैसे ही यह मन भी प्राणरूप ही हे