Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
वैराग्यात्कारणाभ्यासाद्युक्तितो व्यसनक्षयात् ।
परमार्थावबोधाच्च रोध्यन्ते प्राणवायवः ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार प्राण के निरोध से मनो-निरोध की सिद्धि के लिए दोनों की एकता का प्रतिपादन कर
निरोध का उपाय बतलाते हैं।
वैराग्य से, प्राणायाम के अभ्यास से, समाधि से, चित्त के बाह्मविषयों में गमनरूप दुरभ्यास के
विनाश से ओर परमार्थतत्त्व के ज्ञान से प्राणवायु का निरोध किया जाता हे