Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 87–89
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 87–89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 87-89
संस्कृत श्लोक
स्पन्दः प्राणमरुच्छक्तिश्चलद्रूपैव सा जडा ।
चिच्छक्तिः स्वात्मनः स्वच्छा सर्वदा सर्वगैव सा ॥ ८७ ॥
चिच्छक्तेः स्पन्दशक्तेश्च संबन्धः कल्प्यते मनः ।
मिथ्यैव तत्समुत्पन्नं मिथ्या ज्ञानं तदुच्यते ॥ ८८ ॥
एषा ह्यविद्या कथिता मायैषा सा निगद्यते ।
परमेतत्तदज्ञानं संसारादिविषप्रदम् ॥ ८९ ॥
हिन्दी अर्थ
तब वे शक्तियाँ किसकी है, यह आशंका होने पर कहते हैं।
स्पन्दन प्राणवायु की शक्ति है, वह चलद्रूप ओर जड़ ही है। चित्शक्ति आत्मा की है, वह सर्वदा
स्वच्छ और सर्वगामी है। चित्ृशक्ति और स्पन्दशक्ति का जो सम्बन्ध है, वही मन हे । मिथ्या ही वह
उत्पन्न हुआ है, अतएव मिथ्याज्ञान कहा जाता है। यही कार्य अविद्या है, यही माया शक्ति कही जाती
है, यही संसारादिरूप विष देनेवाला वह परम अज्ञान है