Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
कः किलात्र कुतः खेदो यन्मूर्खः परितप्यते ।
दुःखायैव हि जायन्ते करभाः प्राकृतास्तथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस दुःख का कोई निमित्त होता है, उस दुःख का, निमित्त के निवारण से, निवारण किया जा
सकता है, मूर्खो का दुःख तो निर्मित है, अतः उसका निवारण नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैँ ।
यहाँ पर दूसरा कौन है ? जिससे मूर्ख को खेद होता है ? जिससे कि मूर्ख सन्तप्त होता हे । गधे
और मूर्ख दुःख के लिए ही उत्पन्न होते हैं इनके लिए शोक करना ठीक नहीं है, क्योकि इनके सदृश
असंख्य मूढ योनिर्यो दिखाई देती हैं उनके समान ही ये भी उपेक्षणीय हैं