Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
न पश्यत्येव योऽत्यर्थं तस्य कः खलु दुर्मतिः ।
विचित्रमञ्जरी चित्रं संदर्शयति काननम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्र के रहने पर भी जो दूरदृष्ट को, द्वेष आदि
से सदा नहीं देखता, कौन दुर्मति पुरुष उसे विचित्र चिड़ियों से चित्रित वन को दिखला सकता है ? (जो
स्वयं नहीं देखता उसे दिखलाना अनुचित है, यह सूचन करने के लिए योऽन्यः“ ऐसा कहने के बदले
“अत्यर्थान पश्यति“ यह कहा)