Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verses 62–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 62,63
संस्कृत श्लोक
एवं सत्यावबोधेन स्वात्मैवेदमिति स्थितिः ।
मनः सुगलितं विद्धि सूर्यभासा तमो यथा ॥ ६२ ॥
मनःसर्पः शरीरस्थो यावत्तावन्महद्भयम् ।
तस्मिन्नुत्सारिते योगाद्भयस्यावसरः कुतः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
मनोनाश के उपाय का उपसंहार करते हैं।
परमार्थ तत्त्व का ज्ञान होने से यह जगत आत्मा ही है, ऐसा निश्चय स्थिर हो जाता है, तब आप
मन को जैसे सूर्य की कान्ति से अन्धकार का विनाश होता है वैसे ही विनष्ट जानिये जब तक
मनरूपी साँप शरीर में है, तब तक महाभय रहता है, मनरूप सर्प को समाधि से हटा देने पर भय
का अवसर कहाँ से हैं ?