Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
मूलान्यपि सुसूक्ष्माणि कठिनाशयकर्कशा ।
तृष्णा परशुधारेव वल्गन्ति विनिकृन्तति ॥ १६ ॥
निपतत्यवटे मूढस्तृष्णामनुसरज्जनः ।
नीलामनुपतञ्छ्वभ्रतृणशाखां यथैणकः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्दय चित्त से कर्कश तृष्णा कुल्हाड़े की धार के समान शीघ्र गिरती हुई धर्म और ज्ञान के मूलों
को तथा दया, विवेक आदि के छोटे-छोटे अंकुरों को भी काट डालती है। जैसे मृग कुएँ के ऊपर
उगे हुए हरे तिनकों की ओर जाता हुआ अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है, वैसे ही तृष्णा का अनुसरण
करता हुआ मूढ पुरुष नरक में गिरता है