Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
तृष्णया वायवो वान्ति शैलास्तिष्ठन्ति तृष्णया ।
तृष्णयैव धरा धात्री त्रैलोक्यं तृष्णया धृतम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
सारा संसार व्यवहार तृष्णा से ही होता है, इस आशय से कहते हैं।
तृष्णा से ही वायु बहती है, तृष्णा से पर्वत खड़े हैँ, तृष्णा से ही पृथ्वी जीवों का धारण करती
है, सारा त्रैलोक्य तृष्णा से ही धारण किया गया है