Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 15, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यदा यदोदेति तदा महामोहप्रदायिनी ।
तृष्णा कृष्णानिशेवेयमनन्तात्मविकारिणी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश में मेघगर्जन, वृष्टि आदि अनेक
विकार करनेवाली वर्षा ऋतु की अँधेरी रात जब-जब उदित होती है, तब-तब महामोहप्रद होती है,
वैसे ही अनन्त आत्मा में विकार करनेवाली यह तृष्णा भी जब-जब उदित होती है तब-तब महामोह
देती है