Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 10–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 17, verses 10–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अजरामरमात्मानं दृष्ट्वा बुद्धिमतां वर ।
जरामरणशङ्काभिर्मा मनः कलुषं कृथाः ॥ १० ॥
पदार्थतत्त्वं नेदं ते नायं त्वमसि राघव ।
किंचित्तदन्यदेवेदमन्य एवासि राघव ॥ ११ ॥
असदभ्युदिते विश्वे सतीवासति संस्थिते ।
त्वयि तत्तामतिगते तृष्णायाः संभवः कुतः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, अजर, अमर आत्मा को
जानकर आप जरा व मरण की शंका से मन को कलुषित न कीजिये