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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 28–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 17, verses 28–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

आत्मीये परकीये च सर्वस्मिन्नेव सर्वदा । नष्टे वोपचिते कार्ये सुखदुःखे गृहाण मा ॥ २८ ॥ भावाद्वैतमुपाश्रित्य सत्ताद्वैतमयात्मकः । कर्माद्वैतमनादृत्य द्वैताद्वैतमयो भव ॥ २९ ॥ भवभूमिषु भीमासु भावभावनवात्यया । मा पतोत्पातपूर्णासु दरीष्वन्तः करी यथा ॥ ३० ॥ द्वैतं न संभवति चित्तमयं महात्मन्नात्मन्यथैक्यमपि न द्वितयोदितात्म । अद्वैतमैक्यरहितं सततोदितं सत्सर्वं न किंचिदपि चाहुरतः स्वरूपम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, स्वकीय अथवा परकीय पुत्र-मित्र आदि सारे जगत के वृद्धि को प्राप्त होने पर अथवा नष्ट होने पर आप सुखदुःख का ग्रहण कभी भी न कीजिये