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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

त्यक्ताहंकृतिराश्वस्तमतिराकाशशोभनः । अगृहीतकलङ्काङ्को लोके विहर राघव ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, अहंकार का त्याग कर चुके, स्वस्थ बुद्धिवाले ओर आकाश के सदुश सुन्दर एवं जिन्होंने कलंकरूपी चिह्न का ग्रहण नहीं किया, ऐसे आप लोक में व्यवहार कीजिये । चन्द्रमा रात्रि में केवल भें ही प्रकाशक हूँ“, यों अहंकारयुक्त, क्षयरोगी होने के कारण अस्वस्थबुद्धि तथा कलंक से लांछित भी है, आप वैसे नहीं है, इस तरह इस श्लोक द्वारा चन्द्रमा से श्रीरामचन्द्रजी में व्यतिरेक दर्शाया