Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
एकरूपस्थिरं चक्रं स्वच्छं संतापवर्जितम् ।
नेह संप्राप्यते किंचिदग्नौ हिमकणो यथा ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह पदार्थ समूह एकरूप
से स्थित, स्वच्छ और सन्तापरहित हे । जैसे अग्नि में हिमकण प्राप्त नहीं होता वैसे ही यहाँ कुछ भी
प्राप्त नहीं होता