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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verses 12–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 2, verses 12–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

अथ रामादृतेऽन्येषां तत्र तद्व्यवहारिणी । व्यतीयाय शनैः श्यामा मुहूर्त इव शोभना ॥ १२ ॥ तस्थौ रामस्तु तामेव वासिष्ठीं वचनावलीम् । चिन्तयन्मधुरोदारां करिणीं कलभो यथा ॥ १३ ॥ किमिदं नाम संसारभ्रमणं किमिमे जनाः । भूतानि च विचित्राणि किमायान्ति प्रयान्ति किं ॥ १४ ॥ मनसः कीदृशं रूपं कथं चैतत्प्रशाम्यति । मायेयं सा किमुत्था स्यात्कथं चैव निवर्तते ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त श्रीरामचन्द्रजी को छोडकर ओर लोगों की उस समय के उचित विषयभोग, निद्रा आदि व्यवहारवाली वह मनोहर रात्रि विस्तरो पर मुहूर्त के समान धीरे-धीरे बीत गई । किन्तु श्रीरामचन्द्रजी जैसे हाथी का बच्चा अपनी माता का चिन्तन करता हे वैसे ही श्रीवसिष्ठजी की पूर्वोक्त उदार ओर मधुर उपदेशवाणी का चिन्तन करते हुए बैठे रहे। यह संसार भ्रमण क्या वस्तु है, ये लोग क्या हैं, ये विचित्रभूत क्यो आते हैं और क्यों जाते हैं, मन का स्वरूप कैसा है, कैसे यह निवृत्त होता है, यह माया कहाँ से आविर्भूत हुई है और कैसे यह निवृत्त होती है ?