Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 2, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
मन्दारवनलेखासु या मतिः सा तृणायते ।
याचे तत्पदमात्मीयं संप्राप्स्यामः कदा वयम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्कट मोक्षेच्छा से स्वर्ग भी मुझे तृण के समान मालूम पड़ता है, ऐसा कहते हैं।
नन्दनवन में जो सुखानुभव है, वह जिस परम पद में तृण के तुल्य नगण्य है, उस आत्मामय परम
पद को मैं चाहता हूँ, उसको मैं कब प्राप्त होऊँगा ?