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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 20, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

पुण्य उवाच । कः पिता किं च वा मित्रं का माता के च बान्धवाः । स्वबुद्ध्यैवावधूयन्ते वात्यया जनपांसवः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उननीसवाँ सर्गे समाप्त बीसवाँ सर्ग पुण्य द्वारा पावन के तथा अपने नाना योनियों में जन्मों का शोक-मोह की निवृत्ति के लिए वर्णन । शोक मोहमूलक है, मोह के निरास द्वारा ही इसका शोक दूर करना चाहिये, यों समझ रहे पुण्य शोक के विषयभूत पिता आदि के अनिर्वचनीय होने से उनका मिथ्यात्व की प्रतिज्ञा कर ज्ञान से उसकी निरसनीयता का वर्णन करते हैं। पुण्य ने कहा : हे वत्स, कौन पिता है अथवा कौन मित्र है, कौन माता है और कौन बन्धु-बान्धव है, तत्त्वतः इन सभी का निर्वचन नहीं हो सकता है । अपनी भ्रमरूपी आँधी से ही ये जनरूपी धूलिकण उत्पन्न होते हैं अथवा अपनी विवेक बुद्धिरूप आँधी से ही ये स्वजनरूपी धूलिकण निवारित होते हैं