Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 31–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 22, verses 31–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 31-41
संस्कृत श्लोक
पुनर्दिनैककलनाशर्वरीसंस्थितिः पुनः ।
पुनस्तान्येव कर्माणि लज्जायै नच तुष्टये ॥ ३१ ॥
पुनरालिङ्ग्यते कान्ता पुनरेव च भुज्यते ।
सेयं शिशुजनक्रीडा लज्जायै महतामिह ॥ ३२ ॥
तमेव भुक्तविरसं व्यापारौघं पुनःपुनः ।
दिवसे दिवसे कुर्वन्प्राज्ञः कस्मान्न लज्जते ॥ ३३ ॥
पुनर्दिनं पुना रात्रिः पुनः कार्यपरम्पराः ।
पुनःपुनरहं मन्ये प्राज्ञस्येयं विडम्बना ॥ ३४ ॥
ऊर्मितां पुनरासाद्य पुनरेति निरूर्मिताम् ।
यथा जलं तथैवायं तां तामेति क्रियां जनः ॥ ३५ ॥
उन्मत्तचेष्टिताकारा पुनःपुनरियं क्रिया ।
जनं हासयते प्राज्ञं बाललीलोपमा मुहुः ॥ ३६ ॥
कृतयाप्यनया नित्यं क्रियया कृतकार्यया ।
कोऽर्थः स्यात्तादृशो येन पुनः कर्म न विद्यते ॥ ३७ ॥
कियन्तमथवा कालमिदमाडम्वरं महत् ।
इहास्माभिरनुष्ठेयं किं तावत्समवाप्यते ॥ ३८ ॥
अनन्तेयं शिशुक्रीडा वस्तुशून्यैव वस्तुतः ।
आवृत्त्या क्रियते व्यर्थमनर्थप्रसरार्थिभिः ॥ ३९ ॥
फलमेकं महोदारं नेह पश्यामि किंचन ।
कार्यमस्तीतरत्प्राप्ते यस्मिन्नाम न किंचन ॥ ४० ॥
भोगादृते किमन्यत्स्यात्तद्भव्यमविनाशि यत् ।
एवं संचिन्तयाम्याशु दध्यौ मत्वेत्यसौ बलिः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
पुनः दिन की एकमात्र कल्पना, पुनःरात्रि की स्थिति, फिर वे ही स्नान, भोजन, शयन आदि कार्य,
अभिनव कुछ भी कर्म या सुख नहीं हे, इसलिए उनमें लम्पटता महापुरुषों की लज्जा के लिए ही है, न
कि सन्तोष के लिए हे । पुनः कान्ता का आलिंगन किया जाता है, पुनः उपभोग किया जाता है यहाँ पर
यह बालकों की क्रीडा महान पुरुषों की लज्जा के लिए ही है । एक बार भोग करने से विरस हुए उन्हीं
व्यापारो को प्रतिदिन पुनः-पुनः कर रहा प्राज्ञ पुरुष क्यों नहीं लज्जित होता ? फिर दिन, फिर रात्रि,
फिर कार्य परम्पराएँ, प्राज्ञ पुरुष की दृश्य यह विडम्बना पुनःपुनः किये गये क्रम के अनुकरण के समान
उपहास की हेतु है, ऐसा मैं समझता हूँ। जैसे जल फिर तरंगता को प्राप्त कर फिर निस्तरंग हो जाता है
वैसे ही यह जन उस-उस क्रिया को प्राप्त करता है यानी व्यर्थ ही उन पूर्वकृत क्रियाओं का अनुकरण
करता है । उन्मत्त की चेष्टा की तरह यह पुनःपुनः की जानेवाली क्रिया, जो बाललीला की तरह है, प्राज्ञ
पुरुष को बार-बार हँसाती है यानी उसे देखकर प्राज्ञ पुरुष बार-बार हैसता हे । नित्य की गई भी इस
निष्प्रयोजन क्रिया से कौन ऐसा प्रयोजन सिद्ध होगा, जिसके प्राप्त होने पर फिर कर्म नहीं रहता है यानी
कृतकृत्यता हो जाती हे । अथवा कितने समय तक यह बड़ा भारी आडम्बर (दृष्ट ओर अदृष्ट फल के
लिए कर्मसंघात) हमें करना पड़ेगा, उससे हमें क्या प्राप्त होगा ? वस्तुतः वस्तु शून्य ही यह अनन्त
शिशु क्रीड़ा दुःखपरम्परा चाहनेवाले पुरुषों द्वारा ही बार-बार की जाती हे । जिसके प्राप्त होने पर कोई
भी अन्य कार्य कर्तव्य नहीं रहता, वैसे महाउदार अद्वितीय फल को (पुरुषार्थ को) यहाँ मैं कुछ भी नहीं
देखता | क्षणिक, तुच्छ विषयसुख के सिवाय दूसरा नित्य वह उत्तम सुख क्या है, ऐसा मैं विचार करता
हूँ, यह सोचकर राजा बलि शीघ्र ध्यानमग्न हो गये