Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 22, Verses 44–49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 22, verses 44–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 44-49
संस्कृत श्लोक
यथा सकलदुःखानां सुखानां च महामते ।
यत्र सर्वे भ्रमाः शान्ताः कोऽसौ सीमान्त उच्यते ॥ ४४ ॥
कोपशान्तो मनोमोहः क्वातीताः सकलैषणाः ।
विरामरहितं कुत्र तात विश्रमणं चिरम् ॥ ४५ ॥
किं प्राप्तेह समस्तेभ्यः प्राप्येऽस्मिंस्तृप्तिमान्पुमान् ।
किं दृष्ट्वा दर्शनं भूयो न तातोपकरोत्यलम् ॥ ४६ ॥
अत्यन्तबहवोऽप्येते भोगा हि न सुखावहाः ।
क्षोभयन्ति मनो मोहे पातयन्ति सतामपि ॥ ४७ ॥
तत्ताताविहतानन्दसुन्दरं किंचिदेव मे ।
तादृक्कथय यत्रस्थश्चिरं विश्रान्तिमेम्यहम् ॥ ४८ ॥
इत्याकर्ण्य पुरा निशाकरकरस्पर्धालुगुच्छस्खलत्पुष्पापूरकृतावगुण्ठनपदस्योक्तं तले तेन मे ।
पित्रा स्वर्गहृतस्य सागरतरोः संरोपितस्याजिरे स्फाराकाररसायनासवसमं संमोहशान्त्यै वचः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
है महामते, संसार सीमा की अवधि वह कौन कहा जाता है, जहाँ पर सब दुःखो ओर सुखों के
सम्बन्ध के सब भ्रम शान्त हो जाते हैं ? मन का मोह कहाँ पर शान्त है, सब एषणाएँ कहाँ पर बीत चुकी
हैं, हे तात, पुनरावृत्तिरहित चिरविश्राम कहाँ पर है ? पुरुष किसको प्राप्त होकर इस लोक से
ब्रह्मलोकपर्यन्त प्राप्त होनेवाले सब सुखों के विषय में तृप्तिमान हो जाता है । हे तात, किसके दर्शन
करके फिर अन्य फल की अभिलाषा नहीं रहती ? अत्यन्त प्रचुर भी ये भोग सुखावह नहीं हैं, ये सन्त
पुरुषों के मन को भी क्षुब्ध करते हैं और मोह में डालते हैं। इसलिए हे तात, अविनाशी आनन्द से सुन्दर
कोई वैसा पद मुझसे कहिये, जहाँ पर स्थित होकर मैं चिरकाल तक विश्रान्ति को प्राप्त होऊँ। प्राचीन
काल में चन्द्रमा की किरणों के साथ सौन्दर्य, अमृतरसपूर्णता आदि गुणों की अधिकता होने के कारण
स्पर्धा करनेवाले फूल और फलों के गुच्छों से गिर रहे फूलों और फलों के समूह से आच्छन्न मूल
प्रदेशवाले, स्वर्ग से जबरदस्ती लाकर अपने आंगन में लगाये गये कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हुए मेरे पिता
विरोचन ने पूर्वोक्त प्रश्न को सुनकर उस कल्पवृक्ष के प्रचुर रसायनरूपी आसवों के तुल्य मधुर जो
वचन मेरे अज्ञान के निवारण के लिए कहा, उसका मुझे स्मरण हो आया