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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 24, Verses 65–66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 24, verses 65–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 24 · श्लोक 65,66

संस्कृत श्लोक

दन्तैर्दन्तान्प्रसंपीड्य भोगेष्वरतिमाहरेत् । देशाचाराविरुद्धेन बान्धवैकमतेन च ॥ ६५ ॥ पौरुषेण क्रमेणादौ धनानि समुपार्जयेत् । धनैरभ्याहरेद्भव्यान्सुजनान्गुणशालिनः ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

भोगों की निंदा से विचार उत्पन्न होता है और विचार से भोगों की निंदा उत्पन्न होती हे, ये दोनों जैसे समुद्र किरणों द्वारा मेघो को भरता है ओर मेघ वृष्टि द्वारा समुद्र को भरते हैं वैसे ही परस्पर एक दूसरे को पूर्ण करते हैँ । भोग निंदा, विचार ओर अविनाशी आत्मदर्शन ये तीनों जैसे परस्पर अत्यन्त प्रीतिवाले मित्र एक दूसरे के प्रयोजन को सिद्ध करते हैँ वैसे ही परस्पर एक दूसरे की वृद्धि करते हैँ । पहले देव का अनादर कर पौरुष प्रयत्न से दाँतों से दाँतों को पीसकर भी भोगों में विरक्ति प्राप्त करे ॥ ६ ३, ६४॥ देश और आचार से अविरुद्ध, बन्धु-बन्धवजनों से सम्मत पौरुष से पहले क्रमशः धनोपार्जन करे । धन से कुलीन गुणशाली सज्जनं की आराधना कर उन्हें वशीभूत करे, उनके सत्संग से भोगों में विरक्ति होती है