Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 11–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 25, verses 11–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 11-14
संस्कृत श्लोक
पाताले भूतले स्वर्गे स्त्रियो रत्नोपलादयः ।
सारं तदपि तुच्छेन कालेनाशु निगीर्यते ॥ ११ ॥
एतावन्तमहं कालं भृशं बालोऽभवं पुरा ।
यः कुर्वन्द्वेषममरैस्तुच्छया जगदिच्छया ॥ १२ ॥
मनोनिर्माणमात्रेण जगन्नाम्ना महाधिना ।
त्यक्तेनानेनकोऽर्थः स्यात्को नु रागोमहात्मनः ॥ १३ ॥
कष्टं चिरतरं कालमनर्थोऽर्थधिया मया ।
अज्ञानमदमत्तेन कालेन स्वेन सेवितः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ भोग अज्ञानियों की दृष्टि में सारभूत प्रतीत होता है, वह भी नश्वर होने से अन्त में
दुःखदायी होता है। अतएव उनकी दृष्टि में भी वह असार ही है, इस आशय से कहते हैं।
पाताल में, भूतल में, स्वर्ग में, स्त्रियाँ, रत्न, मणियाँ आदि जो सार पदार्थ हैं, उन्हें भी तुच्छ काल
शीघ्र निगल जाता है। पहले इतने समय तक तुच्छ जगत के आधिपत्य की इच्छा से देवताओं के साथ
द्वेष करता हुआ मैं अत्यन्त मूर्ख ही हुआ था । एकमात्र मन के निर्माणरूप जगदाधिपत्यनामक इस
महामानसिक दुःख का त्याग न करने से कोन पुरुषार्थ हे और महात्मा का उनमें राग ही क्या है ? भाव
यह है कि अनुराग होने पर उसमें पुरुषार्थता बुद्धि हो सकती है, पर महात्मा का उसमें अनुराग नहीं
होता। कष्ट की बात है, अज्ञानरूपी मद से मत्त अपने मृत्युभूत स्वयं ही मैंने बहुत समय तक अनर्थका
पुरुषार्थ बुद्धि से सेवन किया