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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 25, Verses 7–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 25, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

अङ्गमङ्गेन संपीड्य मांसं मांसेन च स्त्रियः । पुराहमभवं प्रीतो यत्तन्मोहविजृम्भितम् ॥ ७ ॥ दृष्टान्तदृष्टयो दृष्टा भुक्तं भोक्तव्यमक्षतम् । आक्रान्तमखिलं भूतं जातं किमिव शोभनम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अब धनोपार्जन के फलरूप स्त्री आदि का भोग भी असार है, ऐसा विचार कर उनके लिए शोक करते हैं। पहले मैं स्त्री के अंगो से अंग का, मांस से मांस का संमर्दन कर जो प्रसन्न हुआ था वह मेरा अज्ञान विलास ही था। सब भावों के दृष्टान्तभूत महावैभव मैंने स्वयं देखे, बेरोक-टोक राज्यादि भोगों का भोग किया, सब प्राणियों को अपने सामर्थ्य से झुका दिया, फिर भी अविनाशी सुख क्या उत्पन्न हुआ ? भाव यह कि अनादि संसार में सभी का कभी ऐसा वैभव रहा होगा और मेरी भी अनेकों बार हजारों दुर्दशाएँ हुई होगी और आगे भी हो सकती हैं, फिर यह वैभव कौन-सा शोभन है ?