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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 26, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 26, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति संचिन्त्य बलवान्बलिरामीलितेक्षणः । दध्यौ कमलपत्राक्षं शुक्रमाकाशमन्दिरम् ॥ १ ॥ सर्वस्थं चिन्तयानं तु नित्यध्यानोऽथ भार्गवः । चेतःस्थं ज्ञातवान् शिष्यं बलिं गुर्वर्थिनं पुरे ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

पचीसवाँ सर्गे समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग स्मृति से बलि के समीप गये हुए शुक्राचार्य के बलि के प्रति तत्त्वज्ञानोपदेश का ओर तदनन्तर आकाशगमन का वर्णन । श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, बलवान बलि ने ऐसा सोचकर, आँखें बन्द कर कमलनयन शुक्राचार्य का ध्यान किया जिनका ब्रह्माकाश ही विश्रान्ति स्थान है | तदनन्तर नित्य ध्यान परायण शुक्राचार्यजी ने सबके अन्तर्यामी ब्रह्मरूप होने के कारण सबमें स्थित अपना चिन्तन कर रहे अपने चित्त में स्थित शिष्य बलि को अपने नगर मेँ तत्त्वजिज्ञासा से गुरुदर्शन के लिए इच्छुक जाना