Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 26, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 26, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
राजन्यावदयं देहस्तावन्मुक्तधियामपि ।
यथाप्राप्तक्रियात्यागो रोचते न स्वभावतः ॥ १६ ॥
इति कथितवताथ भार्गवेण स्फुटजलराशिपथा महाजवेन ।
प्लुतमलिशबले नभोन्तराले तरलतरङ्गवदाकुले ग्रहौघैः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि बलि की ओर से यह प्रश्न हो कि आप मुक्त हैं, अतएव कृतकृत्य हैं, यदि आप वहाँ पर न
जायें, तो आपकी क्या क्षति है ? तो इस पर कहते हैं।
हे राजन्, जब तक यह शरीर है, तब तक मुक्तपुरुषों को भी यथाप्राप्त क्रिया का त्याग स्वभावतः
अच्छा नहीं लगता।
तदनन्तर यह कह चुके शुक्राचार्यजी ग्रहों से व्याप्त अतएव पुष्प पराग से लिप्त भँवरे के समान
कर्बुरित आकाश के मध्य में स्पष्ट मेघ और समुद्र के ऊपरी मार्ग से चंचल तरंग के समान बड़े वेग
से उड़े