Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 27, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
बलिनाम्नः शरीरस्य च्छिन्ने शिरसि भासुरे ।
चितः किं तद्भवेच्छिन्नं सर्वलोकावपूरणात् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
देहादि द्वैत भले ही हो, तथापि उसकी क्षति से असग, पूर्ण, चिन्मात्ररूप मेरी कोड क्षति नहीं है,
ऐसा कहते हैं।
बलिनामधारी शरीर के प्रकाशमान सिर के कटने पर सब लोकों को पूर्ण करनेवाले चैतन्य का क्या
कटा ?