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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verses 20–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 27, verses 20–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 20-22

संस्कृत श्लोक

दृश्यदर्शननिर्मुक्तकेवलामलरूपवान् । नित्योदितो निराभासो द्रष्टास्मि परमेश्वरः ॥ २० ॥ कल्पनाविकलाकारः कालकान्तकलामयः । आभासमात्रमुदितो नित्याभासविवर्जितः ॥ २१ ॥ भारूपैकस्वरूपेऽस्मिन्स्वरूपेण जयाम्यहम् । चेत्यरञ्जनरिक्ताय विमुक्ताय महात्मने ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार कोऽहम्‌" (मैं कौन हूँ) इस प्रश्न का उत्तर भी स्वयं मुझे ज्ञात हो गया है, ऐसा कहते हैं । मैं दृश्य-दर्शन से रहित केवल अद्वितीय निर्विकार स्वरूपवाला, नित्य उदित, भ्रान्तिरहित साक्षी परमेश्वर हूँ। इस प्रकार के प्रकाशमात्र स्वरूपवाले मुझमें नित्य स्वात्मा के अवभास से शून्य जल अथवा केशों के अग्रभाग में प्रतिबिम्बित चन्द्रकला के सदश स्वकल्पनारूपी अपरिच्छिन्न जीवभाव जो उदित हुआ हे, वह एकमात्र भ्रान्ति ही है, वास्तविक नहीं हे, इसलिए उस जीवभाव को मे चरम साक्षात्कार वृत्ति से प्रदीप्त हुए स्वरूप से ही अभिभूत करता हू । चेत्य के सम्बन्ध से शून्य, विमुक्त महात्मा प्रत्यकचेतनरूप स्वरूपभूत ब्रह्म को नमस्कार है