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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 27–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 29, verses 27–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

भोगैककृपणायेदं जगज्जङ्गलखण्डकम् । दातुं शोच्याय शक्राय वयोज्येष्ठाय कार्यवित् ॥ २७ ॥ क्रममाणो बलेनात्र वञ्चयित्वा बलिं हरिः । बबन्ध पातालतले भूगेह इह वानरम् ॥ २८ ॥ अद्यासौ संस्थितो राम पुनरिन्द्रत्वहेतुना । जीवन्मुक्तवपुः स्वस्थो नित्य ध्यानविषण्णधीः ॥ २९ ॥ पातालकुहरे तिष्ठञ्जीवन्मुक्तमतिर्बलिः । आपदं संपदं दृष्ट्या समयैव स पश्यति ॥ ३० ॥ नास्तमेति न चोदेति तत्प्रज्ञा सुखदुःखयोः । समा स्थिरकरा चित्रलेख्या सूर्यावलिर्यथा ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

सिद्धि देनेवाले भगवान श्रीहरि "बलि संसारी विविध भोगों का अभिलाषी नहीं है” ऐसा निर्णय कर बलि की अभिलाषा की सिद्धि के लिए उस यज्ञ में आये ॥ २ ६॥ एकमात्र भोग मे आसक्त होने के कारण कृपण अतएव शोचनीय तथा अवस्था मेँ ज्येष्ठ इन्द्र को जगद्रूपी जंगल का भाग देने के लिए अपने मायाबल से तीन लोकों को अपने पग से नाप रहे कार्यकुशल श्रीहरि ने बलि को ठगकर जैसे कोई भूगर्भ मेँ बने हए पृथिवी के अन्दर स्थित घर में बन्दर को बधे वैसे ही पाताल में बलि को बाँध दिया । अब भी जीवन्मुक्त शरीरवाला, निर्विकल्प समाधि में बुद्धिरहित ओर नित्य आत्मनिष्ठ बलि पाताल में पुनः इन्द्रत्वप्राप्ति के हेतुभूत प्रारब्ध से युक्त होकर स्थित हे