Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verses 36–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 29, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 36-38
संस्कृत श्लोक
पुनरेतेन बलिना जगदिन्द्रतयाखिलम् ।
अनुशास्यमिदं राम बहून्वर्षगणानिह ॥ ३६ ॥
न तस्येन्द्रपदप्राप्त्या तुष्टिः समुपजायते ।
न तस्य स्वपदभ्रंशादुद्वेग उपजायते ॥ ३७ ॥
समः सर्वेषु भावेषु सर्वदैवोदिताशयः ।
संप्राप्तमाहरन्स्वस्थ आकाश इव तिष्ठति ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, फिर इस बलि को सारे जगत का इन्द्ररूप से बहुत वर्षो तक शासन करना
होगा । बलि को इन्द्रपद की प्राप्ति से न संतोष है और न अपने पद से च्युत होने का दुःख ही है।
सब भावों में सम तथा सदा ही सन्तुष्टचित्त बलि प्रारब्ध से प्राप्त वस्तु का उपभोग करता हुआ
आकाश के समान स्वस्थ है