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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 29, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

चिदादित्यो भवानेव सर्वत्र जगति स्थितः । कः परस्ते क आत्मीयः परिस्खलसि किं मुधा ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि शत्रु ओर मित्र में समद्रष्टि कैसे हो सकती है ? तो इस पर कहते है । आदित्य के समान सबको प्रकाशित करनेवाले चैतन्यरूप आप ही सारे जगत में स्थित हैं ऐसी अवस्था में शत्रु की देह मेँ भी प्रकाशक आत्मरूप आप ही हैं, इसलिए वैषम्यदुष्टि होने का कोई कारण नहीं हे, कोन आपका शत्रु है और कौन आपका आत्मीय है ? क्यों वृथा आप यह शत्रु है, यह मित्र है ऐसी भूल करते हैं ?