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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 30, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 30, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 30 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

चकार जगतां राज्यं समाक्रान्तसुरासरः । दन्ती निरस्तहंसौघो नलिन्यामलिनामिव ॥ ४ ॥ अथासावसुराधीशः कुर्वंस्त्रिभुवनेशताम् । कालेन सुषुवे पुत्रानङ्कुरानिव माधवः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे हाथी हंसों को हटाकर कमलिनी मेँ भ्रमरो का राज्य करता हे वैसे ही उसने देवता ओर असुरो के अधिपतियों पर विजय प्राप्त कर तीनों लोकों का राज्य किया । तदुपरान्त तीनों भुवनो पर शासन कर रहे उस दैत्यराज ने समय आने पर जैसे वसन्त ऋतु बहुत से अंकुर उत्पन्न करती है वैसे ही बहुत से पुत्र उत्पन्न किये