Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 31, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ दुःखपरीतात्मा हरिणा हतदानवे ।
प्रह्लादश्चिन्तयामास मौनी पातालकोटरे ॥ १ ॥
कोन्वस्माकमुपायः स्याद्य एवेहासुराङ्कुरः ।
तीक्ष्णाग्रो जायते तं तं भुङ्क्ते शाखामृगो हरिः ॥ २ ॥
न कदाचन पाताले दैत्या दोर्दण्डशालिनः ।
स्थिरा बभूवुरुद्भिन्नाः पद्मा इव हिमाचले ॥ ३ ॥
उत्पत्त्योत्पत्त्य नश्यन्ति भासुराकारघर्घराः ।
क्षीणप्रस्फुरितारम्भास्तरङ्गा इव वारिधेः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर पातालगर्त में, जहाँ दानवों का विनाश किया
गया था वहाँ दुःखसन्तप्त अतएव मौनी प्रह्नाद ने विचार किया। हमारा कौन सहायक हो ? सम्पत्तिरूपी
पल्लवो को उत्पन्न करने में समर्थ जो भी असुररूपी वृक्ष का अंकुररूप तेजस्वी यहाँ पर पैदा होता है,
उसी को श्रीहरि रूपी बन्दर खा डालता हे । जैसे हिमालय में विकसित कमल कभी स्थिर नहीं होते वैसे
ही पाताल में वज्रदण्डशाली बलवान दैत्य कभी भी अंकुरित होकर स्थिर नहीं हुए । समुद्र की तरगों के
समान प्रखर आकृति ओर गर्जनवाले सब दैत्य उत्पन्न हो होकर विलीन हो जाते हैं, उनका तनिक
विकसित कार्य नष्ट कर दिया जाता हे
सर्ग सन्दर्भ
तीसवाँ सर्ग समाप्त इकतीसवाँ सर्ग प्रह्लाद का श्रीहरि के पराक्रम का चिन्तन, आत्मीयो के कल्याण का विचार और भगवद्भक्ति से भगवद्भाव का वर्णन |