Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 32, Verses 29–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 32, verses 29–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 29-32
संस्कृत श्लोक
यो यो यादृग्गुणो जन्तुः स तामेवैति संस्थितिम् ।
सदृशेष्वप्यजेषु श्वा न मध्ये रमते क्वचित् ॥ २९ ॥
न तथा दुःखयन्त्यङ्गे मज्जन्त्यो वज्रसूचयः ।
वैसादृश्येन संबद्धा यथैता वस्तुदृष्टयः ॥ ३० ॥
यद्यत्र क्रमसंप्राप्तमुपपन्नमनिन्दितम् ।
तदेव राजते तत्र जलेऽम्भोजं नतु स्थले ॥ ३१ ॥
क्वाधमः प्राकृतारम्भो हीनकर्मरतिः सदा ।
वराको दानवो हीनजातिर्भक्तिः क्व वैष्णवी ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कहिये कश्यप ऋषि के वंशधर होने के कारण वे भी तुम्हारे सदश ही हैं, तो गुणों में वैषम्य होने
के कारण ऐसी बात नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
जो-जो जैसे गुण का प्राणी होता है, वह उसी तामसी, राजसी या सात्त्विकी स्थिति को प्राप्त
होता है, यही बात उचित है। यद्यपि बकरे कुत्ते के सदृश ही हैं फिर भी कुत्ता उनके बीच में शोभित नहीं
होता। शरीर में चुभती हुई वज की सुइयाँ वैसे दुःख नहीं देती जैसे की अनौचित्य से संबद्ध ये वस्तु
दृष्टियाँ दुःख देती है । जो जहाँ पर क्रम से प्राप्त हो, उचित हो ओर अनिन्दित हो, वही वहाँ पर
सुशोभित होता है । देखिये न, कमल जल में ही शोभित होता है, स्थल में नहीं । कहाँ तो पामरोचित
कार्य करनेवाला, सदा निन्दित कर्मो मेँ निरत ओर तामस योनि अधम शोचनीय दानव (प्रह्नमाद) और
कहाँ भगवान विष्णु की भक्ति ?