Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 33, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
त्यक्तभोगादिकलनं विश्रान्तिमनुपागतम् ।
चेतः केवलमस्यासीद्दोलायामिव योजितम् ॥ १४ ॥
प्राह्लादीं तां स्थितिं विष्णुर्देवः क्षीरोदमन्दिरात् ।
विवेद सर्वगतया धिया परमकान्तया ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई पूछे कि तब कैसा उसका चित्त था, तो इस पर कहते हैं।
उसके चित्त ने भोग आदि की कल्पना का त्याग कर दिया था, किन्तु विश्रान्ति सुख को वह प्राप्त
नहीं हुआ था, अतएव वह झूले में लटकाये हुए की तरह बीच में लम्बमान स्थित रहा। भगवान् विष्णु ने
प्रह्माद की उस स्थिति को क्षीर सागर से सब में विद्यमान अपनी परम रमणीय बुद्धि से जान
लिया