Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 100
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 100 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 100
संस्कृत श्लोक
कालत्रयमपश्यन्त्या हीनायाश्चेत्यबन्धनैः ।
चितश्चेत्यमुपेक्षिण्याः समतैवावशिष्यते ॥ १०० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का प्रकारान्तर से उपपादन करते हैं ।
वर्तमान चेत्य की (दृश्य की) उपेक्षा करनेवाले, अतीत चेत्य के वासनारूपी बन्धनों से शून्य ओर
चेत्य के आधारभूत तीनों कालों का दर्शन न कर रहे चैतन्य के भावी चेत्ययोग की भी भावना नहीं की जा
सकती, अतएव समता ही अवशिष्ट रहती है