Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 63–65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 63–65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 63-65
संस्कृत श्लोक
विरिञ्चिभवनात्पारे तत्त्वान्तेऽप्याहरत्पदम् ।
प्रसरत्येव मे रूपमद्यापि न निवर्तते ॥ ६३ ॥
अयं नामाहमित्यन्तः कुतो निरवलम्बना ।
अपर्यन्ताकृतेरेषा किलासीत्स्वल्पता मम ॥ ६४ ॥
भवानयमयं चाहमिति मिथ्यैव विभ्रमः ।
कोदेहः कोऽप्यदेहो वा को मृतः कश्च जीवति ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तर-उत्तर दस गुने विशाल पृथिवी, जल आदि आवरणं से आवृत ब्रह्माण्ड रूप ब्रह्मा
के घर से आगे सांख्य, वैष्णव आदि के शास्त्र में प्रसिद्ध चौबीस तत्त्वो के ओर शेव, पाशुपत आदि के
अभिमत छत्तीस तत्त्वों के अन्त में भी घूम रहा मेरा स्वरूप आज भी घूमता ही है, वापिस नहीं होता हे ।
यह देह आदि मैं हूँ, इस प्रकार की निराधार यह कल्पना, इतने दिनों तक मेरे हृदय में कहाँ से हुई ?
जिसकी आकृति का आर-पार नहीं है, ऐसी मेरी यह स्वल्पता कैसे हुई ? ये आप हैं, यह मैं हूँ, यह
मिथ्या भ्रान्ति ही है। कौन शरीर है ? शरीर ही जब प्रसिद्ध नहीं है, तो अशरीर भी कौन है ? कारण कि
वन्ध्या के पुत्र की नाई वन्ध्यापुत्र को मारनेवाली अप्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार कौन मरा ? प्राण ही जब
प्रसिद्ध नहीं हैं, कौन उससे वियुक्त हुआ और कौन जीता है यानी प्राण धारण करता हे ?