Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 72–75
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 72–75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 72-75
संस्कृत श्लोक
दारुवारिदृषन्मात्रे लुलितो यो धरातले ।
धिग्वराकमनात्मज्ञं तं कुदानवकीटकम् ॥ ७२ ॥
अविद्यैकात्मभिर्द्रव्यैरविद्यामयमङ्गकम् ।
अज्ञेन संतर्पयता किं नाम गुरुणा कृतम् ॥ ७३ ॥
वर्षाणि कतिचित्प्राप्य जगच्छ्रीमठिकामिमाम् ।
किं नाम प्रापदुचितं हिरण्यकशिपुः किल ॥ ७४ ॥
अनास्वाद्येदमानन्दं जगद्राज्यशतान्यपि ।
समास्वादयता नेह किंचिदास्वादितं भवेत् ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
भूतल में, जहाँ पर वनदुर्ग में लकड़ियाँ, जलदुर्ग
में जल और गिरिदुर्ग में पत्थर विपत्तियं के समय शरण होते हैं, स्वामित्व के अभिमान से जो सतृष्ण
हुआ उस अज्ञानी बेचारे कुदानवरूपी कीड़े को धिक्कार है । एकमात्र अविद्यात्मक अन्न पान आदिपदार्थो
से अविद्यामय गर्हित शरीर को तृप्त कर रहे अज्ञानी हमारे पिता ने क्या किया ? कुछ वर्षो तक इस
जगद्रूप सम्पत्तियुक्त छोटे से मठ को पाकर हिरण्यकशिपु ने क्या कश्यप के कुल मेँ जन्म के अनुरूप
परमपुरुषार्थ प्राप्त किया इस आत्मरूप आनन्द का आस्वाद न लेकर यहाँ सैकड़ों जगद्राज्यो का
आस्वाद ले रहे पुरुष को कुछ भी आस्वाद नहीं मिला